क्या आप भी चुप चाप ट्राफिक पुलिस को रूपये देके आगे बढ़ जाते हैं?

क्या आप भी चुप चाप ट्राफिक पुलिस को रूपये देके आगे बढ़ जाते हैं?

अहमदाबाद में बहुत कम लोग हैं जो बाइक चलाते समय हेलमेट लगाते हैं अधिकतर तो बिना हेलमेट के ही उड़ते हैं. जब मेरी बाइक नयी थी तो ट्राफिक पुलिस का डर रहता था लेकिन अब तो मै भी बिंदास बिना हेलमेट के घूमता हूँ लेकिन कभी कभी ट्राफिक वाले भाई लोग रोक लेते है, बोलते है लाओ लायसंस दिखाओ और PUC दिखाओ अब सालों हो गए बिना PUC के. तो ऐसे मौको पर होता क्या है की ५० रूपये देके निकल लेता हूँ या ५० का चालान कटवा लेता हूँ.

बाल दिवस के अवसर पर

आज १४ नवम्बर है, आज का दिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. बाल दिवसवैसे तो लगभग सभी देशो में मनाया जाता है लेकिन अलग अलग देशों में अलग अलग दिन. भारत में यह पंडित जवाहर लाल नेहरु के जन्म दिन को ही बालदिवस के रूप में मनाया जाता है. उन्हें बच्चे बहुत प्यारे लगते थे, उनका एक चित्र जिसमे वे अपनी कोट की जेब में गुलाब का फूल लिए रहते है बहुत ही प्रशिद्ध है. और बच्चे भी उन्हें प्यार से जवाहर चाचा कहकर बुलाते थे.

यहाँ पर बच्चो की बात हो रही है. बच्चो के साथ बचपन में जो व्यवहार किया जाता वही वो भी बड़े हो कर करते है और बचपन में जो संस्कार पड़ गए वह लगभग पत्थर की लकीर की तरह से दिमाग में बैठ जाते है इसीलिये बच्चो को जहा पर कोई बुराई हो वहा से दूर रखा जाता है.

उन्हें बुरी संगत में आने से बचाया जाता है, सस्थ हे यह भी सच है जिसे जो बनना होता है वह वही बनता है लेकिन अपनी तरफ से किये गए प्रयाश में कोई बुराई नहीं होती है, क्योकि ऐसा करने से मन में कोई अफसोश नहीं रहता है.
अक्षर ऐसा सुनने में आता है की आजकल बच्चे जल्दी ही बड़े हो जाते है यह बात भी सही है क्योकि इन्हें हर वास्तु बचपन में मिल जाती है. घर पर टीवी है, चैनल है, और कौन हमेशा बच्चो के पीछे लगा रहता है कहा जा रहे है, किससे मिल रहे है और क्या कर रहे हैं.
मानव स्वाभाव का एक गुण है की वह बुरी चीजो को जल्दी ही देख लेता है और उन्हें सीख भी लेता है और अच्छी चीजे अक्शर नजर अन्द्दाज हो जाती हैं.

बचपन में जितनी जिज्ञाषा नयी चीजो के प्रति रहती है उतनी बाद में कभी नहीं. कुछ बच्चे जिन्हें गरीबी की वजह या फिर सौतेले माता पिता की वजह से हो उनमे संकुचितता की भावना पैदा हो जाती है और कुछ बच्चो को कुछ अधिक ही लाड प्यार मिल जाता है जो की समाज और घर दोनों के लिए हानिकारक होता है. संकुचितता की भावना अभाव की वजह से अक्शर आती है.

हमारे विनोबा भावे का कहना था की बच्चे भगवान का रूप हैं जब तक पृथ्वी पर बच्चे पैदा होते रहेंगे तब तक भगवान हमसे नहीं रूठा है.
कुछ माँ बाप जिन्हें बच्चे होते है वे बच्चो की वजह से इतना परेश्हन हो जाते है की उन्हें यह कहना पड़ जाता है की बच्चे न होते तो अच्छा होता.  और कुछ माँ बाप जो संतान विहीन है उनकी यह लालशा होती है कोई उनके घर में भी हो जो उन्हें परशान करे, घर में समान और खिलोने तोड़े, यही सब तो बच्चो के होने का सुख होता है.

जितने भी छोटे बच्चे होते है जो ठीक से बोल नहीं सकते है उनमे बहुत ही अधिक मासूमियत होती है खाश कर के उनकी आँखों में लेकिन जल्दी ही यह मासूमियत शरारत में बदल जाती है.

हमारे देश में अभी भी ऐसे बहुत से बच्चे है जो की अपने अधिकार से वंचित हैं, बच्चे तो पढ़ते और खेलते कूदते ही अच्छे लगते है लेकिन उन्हें पता भी नहीं चलता है की खेलना और पढ़ना क्या होता है.

चित्र स्रोत

क्या न करें-अच्छा बच्चा बनने के लिए

आप एक अच्छे बच्चे हैं मेरा मतलब एक अच्छे लड़के या फिर एक अच्छे व्यक्ति हैं, और आप मानते भी हैं इस बात को की आप एक अच्छे बच्चे हैं
कभी किसी कारण से किसी अच्छे आदमी के अंदर आप के लिए यदि ख़राब मानसिकता बन गई तो वह तब तक नही निकलती जब तक आप उसके दामाद नही बन जाते या फिर जब तक वह … इसलिए जिसके अंदर ऐसी मानसिकता एक बार घुस जाए फिर उसके अंदर से यह मानसिकता निकालने का बीड़ा कभी न उठाये अपना काम करते रहे कभी यदि उसकी मानसिकता अपने से ही सुधार हो जाए तो अच्छी बात है
कभी भी यह साबित करने की कोशिश करें की आप एक अच्छे बच्चे हैं

भाषा कनेक्शन: हिन्दी के साथ साथ

हिन्दी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा तो है ही लेकिन आज का समय ऐसा है की किसी एक भाषा से काम चल जाए ऐसा तो है ही नही कम से कम भारत में रह रहे हो तो सम्भव ही नही है

हिन्दी का विस्तार कम तो नही हुआ है बल्कि दिन प्रतिदिन बढ़ा ही है क्योकि यह भाषा एक तो शीखने में अति सरल है साथ ही यह देखने में भी बहुत सुंदर दिखती है

यह एक अच्छी बात भी है कि व्यक्ति को एक से अधिक भाषा का ज्ञान हो, एक तो भारत बहुभाषी देश है अलग अलग प्रदेशो की भाषा भी अलग अलग है और दुखद बात इतनी ही है कि  प्रांतवाद तथा भाषावाद अपनी गहराई तक जड़ जमा चुका है

जैसे हमारे लिए हिन्दी मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा है उसी तरह हमारे ऊपर एक भाषा और भी आ गई है – अंग्रेजी -जो अब हमारी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है इसलिए अंग्रेजी भाषा लगभग हर प्रान्त के व्यक्ति को आत्मसात करनी पड़ती है, इसलिए अपनी मूल भाषा के साथ साथ अंग्रेजी भाषा तो शीखनी  ही पड़ती है  बहुत नही तो सामान्य लिख पढ़ और समझ सकें

एक ही बात नही समझ में नही आती जो अपनी भाषा छोड़कर दूसरी भाषाओ का गाना गाते है  अब जैसे मुझे ही देख लो हिन्दीभाषी हूँ गुजरात में रह रहा हूँ इसलिए गुजराती भाषा भी आती है और अंग्रेजी भाषा का इतना महत्वः है इसलिए अंग्रेजी भाषा भी शीखा हूँलेकिन मेरी गुजराती कि एक सीमा है सुबह का गुजराती अखबार तक ही मेरी गुजराती भाषा शीमित है  और कभी गुजराती भाषा में बोलना किसी से बोलना पड़ गया तो बस इतना ही है और अभ्यास क्रम कि अधिकतर सामग्री गुजराती भाषा में ही उपलब्ध हो पाती है. अब आती है बारी अंग्रेजी की दिन भर का काम मुझे कंप्यूटर पर बैठकर अंग्रेजी में ही करना पड़ता है मतलब की अंग्रेजी भाषा का काम काज तकनीकी तक ही शीमित है

बाकी का सारा  काम  हिन्दी में !

खाने से पहले भगवान का नाम

कुछ साल पहले मै एक धार्मिक किताब में पढ़ा था की खाना खाने से पहले भगवान का नाम लेकर खाना चाहिए और इस का पालन करने के लिए मैंने बहुत मेहनत भी की थी लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ रहा है  की मै इस में सफल नही हो पाया था

एक दो बार शायद सफल भी रहा होऊ पर लगातार बना नही पाया और कुछ दिनों के प्रयास के बाद मैंने इसे आख़िर में छोड़ ही दिया

होता क्या था की जब खाना खाने के लिए बैठता तो एक दो निवाले खाने के बाद ही भगवान का नाम याद आता था तब मै क्रोध में आकर जो भी खाना चबाता होता उसे बहार उगल आता और कुल्ला करके फिर से भगवान का नाम लेकर खाना खाता

लेकिन बाद में मैंने विचार किया की यह काम तो स्वतः ही होना चाहिए इसके लिए इतना सब कुछ करने की क्या जरुरत है भगवान की मर्जी समझ कर के मैंने ऐसा करने का विचार छोड़ दिया अब भगवान का नाम शायद ही खाने के समय लेता हूँ

लेकिन इसका मतलब ऐसा जरा भी न समझे की मै भगवान को नही मानता भगवान में मुझे पुरी श्रद्धा है

आप सब भी शायद भगवान का नाम लेकर खाना खाते होंगे

अच्छे आदमी थे तो नेताजी क्यो बने

अभी कुछ दिनों पहले हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी कह रहे  थे की उन्हें राजनीति  में आना ही नही था मूलतः तो वे एक शिक्षक थे और जब तक वे पढाने  का कम कर रहे थे वे उनके सबसे अच्छे दिनों में से एक थे, लेकिन मेरा मानना है की जब आप एक शिक्सक  थे और वे दिन आपके अच्छे दिनों में से एक थे तो आप इस गन्दी राजनीति में क्यों आ गए, देश का भला करने की इतनी तीब्र इच्छा थी तो आज आपका ये क्या हल हो गया है की आप भारत के इतिहास के अभी तक के सबसे कमजोर प्रधान मंत्री शाबित हो कर रह गए हैं, राजनीति को मै गन्दी से गन्दी वस्तु मानता हूँ लेकिन देस की विडम्बना यह है की देस का जिम्मा ऐसे ही लोगो पर ही रहता है

जो सिर्फ़ अपने भले की सोचते है जो सांठ गांठ  करना जानते है, जो खरीद बेंच का काम करते हैं, जो की एक तत्वज्ञानी भी है क्योकि न तो इनका कोई दोस्त होता है न कोई दुश्मन, जैसे आतंकवादियों का कोई धर्म नही होता कोई जिम्मेदारी नही होती उनके लिए वे जो भी करे वाही सही होता है कुछ उसी तरह से हमारे नेताओ में भी होता है न तो इनका कोई धर्म होता  न ही कोई कर्तव्य, बस सत्ता में बने रहे सत्ता से हटते भी हैं तो सत्ता में बने रहने के लिए ही

हमारे बहुत सारे नेता विचारे आए थे देस का भला करने के लिए लेकिन गलती से अपना भला करने लगे भूल से अपनी झोली भरने लगे

यह मै उन नेताओ के लिए कह रहा हूँ जो की कुछ पुराने है नए में तो मुझे जरा भी भरोषा नही है की उन्हें देस की भावना क्याहोती है यह पता भी होगा की नही उनके के लिए तो बाप की बपौती ही होगी .

मुंबई शहर हादसों का शहर है

मुंबई शहर हादसों का शहर है यहाँ रोज रोज हर मोड़ मोड़ होता है कोई न कोई हादसा, हादशे तो  देखा जाए तो हर जगह होते रहते हैं लेकिन मुंबई में हदशा यह कभी सोया नही रहता हमेशा जगता रहता है , देखो भाइयो मुंबई में फिर से एक हादशा हो गया है , क्या हुआ है आप सभी जानते ही हैं लेकिन हादशे की रिपोर्टिंग करना मेरा कोई उद्देश्य नही है कितने मरे कितने शहीद हुए कितने पकड़े गए यह सब मै नही बताने वाला यह सब तो आप को पता चल ही जाएगा मै तो वह बताना चाह रहा हूँ जो की आप सब बाद में सुनेगे ही मै थोड़ा पहले बता दे रहा हूँ , अरे सोचो जरा ये जो हरा है कब तक होगा एक दो दिन उसके बाद क्या सब शांत हो ही जाएगा न आखिर , उसके बाद क्या कुछ आंकडे सामने आ जायेंगे और कुछ व्यवस्थित रूप से रिपोर्टिंग मिल जायेगी उसके बाद क्या होगा जो भी होगा उसी की तरफ़ मै चाह रहा हूँ की आप अभी से जान लो यह भी मै शायद ठीक से नही बता पाउँगा लेकिन आप का ध्यान जाएगा तो आप ख़ुद ही समझ जायेंगे.

अभी तक आप नही समझे अरे भाई मुंबई इतना बड़ा शहर है इतना सा हादसा मुंबई के लिए न तो बड़ी घटना है न ही देस और दुनिया के लिए मुंबई में इतने सारे लोग काम करते है भारत की नस है यह तो एक दो दिन बाद सब फिर से सामान्य हो जाएगा फिर से ट्रेनों में लोग लोग लटक लटक जाना शुरू हो जायेंगे ,फिर से सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा आतंवादी हमले तो होते ही रहते वैसे भी हम सभी को इसकी आदत शायद पड़ गई है और अगर कुछ लोगो को नही भी पड़ी है तो पड़ जायेगी.