मेरी भाषा और …..

मेरे मन

September 18, 2008 · 1 Comment

मन तुझे खुली छूट है
उदास होने के लिए,
आंसू बहा – बहा रोने के लिए
तू चाहे तड़पना अगर
तो तड़प जी भरकर
मुक्ति नही यदि तुझे कोई
बंधन ही पसंद है
तो बंधा रह मेरे मन
यदि तू जलकर राख होना चाहता है
तो तू हो जा मेरे मन
मै मना नही करूंगा
मेरे मन तू मुक्त है
अपनी इच्छनुसार कुछ भी करने के लिए
कभी जब मै अपने प्राणों को धरूँगा
तो तू खुस रहेना ही
और मुक्त रहेना
हमेशा की तरह
और जीवित रहेना ही मेरे बाद भी.


यह कविता पहेले भी कुछ जगहों पर मै प्रकाशित कर चुका हूँ

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1 response so far ↓

  • shelley // September 18, 2008 at 2:38 pm | Reply

    बंधन ही पसंद है
    तो बंधा रह मेरे मन
    यदि तू जलकर राख होना चाहता है
    तो तू हो जा मेरे मन
    मै मना नही करूंगा
    मेरे मन तू मुक्त है
    अपनी इच्छनुसार कुछ भी करने के लिए
    कभी जब मै अपने प्राणों को धरूँगा
    तो तू खुस रहेना ही
    और मुक्त रहेना
    bahut sundar rachna hai

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